अस्पृशता हा हिंदू धर्मावरील कलंक नसून, तो आमच्या नरदेहावरील कलंक आहे. यासाठी, तो धुवून काढायचे पवित्र कार्य आमचे आम्हीच स्वीकारले आहे.- डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर | कभी हमारा अपना कोई धर्म था| उस धर्म कि धारा सुखी नाहि है| संतो ने उसे प्रवाहित रखा है. गुरु रविदास लिख गये है| धर्म के सार को| वे नया धर्म दे गये है| उस पर चलो| - बाबू जगजीवन राम
Showing posts with label हमें अपनी जाति का अभिमान होना चाहिए. Show all posts
Showing posts with label हमें अपनी जाति का अभिमान होना चाहिए. Show all posts

Saturday, February 15, 2014

सवर्ण हिन्दूओं के जाल मे फसे चमार जातियों के मुक्ति हेतु रविदासीया धर्म


सवर्ण हिन्दूओं के जाल मे फसे चमार जातियों के मुक्ति हेतु रविदासीया धर्म
जय रविदास ! जय भीम !! जय गुरुदेव !!!

उस समय राजा एवं प्रजा पर धर्म ग्रंथो का निर्वविाद अधिकार था. धर्मग्रंथो के अनुसार आचार अर्थात कानून एवं धार्मिक विधि अर्थात नतिकता मानी जाती थी. आज धर्माध धर्म सत्ता समाप्त हो गई है इसलिए धर्म निरपेक्ष लोकतंत्र व खुली अर्थव्यवस्था का आग्रह करते हुए सारा विश्व तानाशाही से लोकतंत्र की और एवं सत्तावाद से मानवतावाद की और एवं धर्माधता से संहिष्णु आध्यात्मिक, धार्मिकता की और बढ रहा है. भारतीय संविधान ही परिपूर्ण जीवनमुल्य के रूप में भारतीयों द्वारा स्वीकार करने से धर्मनिरपेक्ष भारतीय लोकतंत्र में जीवन व्यतीत करने वाले आधुनिक काल के लोगों के दिन प्रतिदिन दिनचर्या में धर्म का महत्व कम हो गया है.
ऐसा होते हुए भी भारत के सभी धर्मो के लोग धार्मिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, पारंपारिक, रितिरिवाजों को जतन करने के नाम पर अपने धर्म संघ का शक्ति प्रदर्शन करते है और भारतीय लोकतंत्र का आधार ही संघ शक्ति अथवा संघटन पर आधारित होने से स्वधर्मियो के संघ शक्ति के बल पर राजनिति करते है और लोकतंत्र द्वारा प्रदान किए हुए सामाजिक, íथक, शैक्षणिक लाभ एवं आपातकाल में परधर्मियों से अपने धर्म बंधुओ को सुरक्षा दिलाने का प्रयत्न करते हैं. इसी से धर्म यह अफीम की गोली है, ऐसा कार्ल मार्क्‍स ने कहा था, लेकिन भारतीय धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में धर्म को ही अधिक महत्व प्राप्त हाने से धर्म यह अफीम की गोली न रहते धारण करणे वाले समाज का सुरक्षा कवच है. यह कहना गलत न होगा.
संपूर्ण भारत में हिन्दू धर्म की कुल 4635 जातियों में से 3527 जातियां सवर्ण हिन्दू और 118 जातियां वर्णबाष्टद्धr(39) अस्पृश्यों की है. सामाजिक सुधार के सभी प्रयोग इसी जाति पर होते है, इसलिए धर्म, जाति-पाति से स्वयं को दूर रखना ही उचित होगा एसी सर्वसाधारण भावना समाज के मन में निर्माण हो गई है इसलिए मैं धर्म मानता नही. मैं फलां धर्म का हूं परंतु प्रवृत्ति से धार्मिक नही. मेरा जन्म फलां धर्मीय माता-पिता से हुआ है इसलिए वही मेरा धर्म है परंतु व्यक्तिगत जीवन में धर्म नाम की कथा मैं नही मानता. मैं सामाजिक, सांस्कृतिक जीवन में धर्म के साथ-साथ आनेवाली रुढि और परंपराओं को मानता हूं. लेकिन देवी-देवता को नही मानता. ऐसी लोगो की धारणा होने के बावजूद प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी धार्मिक संघ से बंधा हुआ है. वही उसकी सामाजिक आवश्यकता भी है क्योंकि एक व्यक्ति को धर्म की आवश्यकता नही रहती, लेकिन व्यक्तियों के समूहों द्वारा निर्मित समाज को धर्म के सिवा दर्जा प्राप्त नही होता.
हिन्दू धर्म ने बहिष्कृत करने के बाद से विश्व के अस्तित्व में आए हुए किसी भी धर्म की पहचान न होते हुए व अस्पृश्य चांभार, ढोर, माला, मादिगा, मोची, चमार, रेगर, आदि समाज-मन में  दरुगधीयुक्त नामों को माथे पर अंकित कर पीढी-दर-पीढी गंदगी भरे काम करते हुए, अन्याय, अत्याचार चुपचाप सहन करते हुए गांव के बाहर रहते हुए किसी तरह जीवनयापन करते. हमारे समाज को महात्मा गांधी जी ने हरिजन नाम दिया. हरिजन का अर्थ है.. सवर्ण हिन्दूओं ने हजारो सालों से अन्याय, अत्याचार कर गांव के बाहर रखा. गंदगीभरे काम करने के लिए मजबुर किया. फिर भी स्वयं को हिन्दू कहलाते है. सवर्ण हिन्दू धर्म के चरणों में ईमानदारी से अपनी पीढियों को जन्म दिया और आज भी जन्म दे रहे है. उनकी रक्षा ष्टद्धr(39)हरिष्टद्धr(39) ही कर सकता है. इसलिए महात्मा गांधी ने हमें हरिजन कहा है.

भगवान रविदासजी महाराज के नाम पर हमारा चर्मकार समाज एक संघ हो सकता है


भगवान रविदासजी महाराज के नाम पर हमारा
चर्मकार समाज एक संघ हो सकता है

अब हमे दलित क्यों कहते हो? ऐसा पूछने पर बहिष्कृत अस्पृश्य गरीब दुर्बल है इसलिए दलित है. हमारा मुख्यमंत्री हुआ भी तो उसे दलित मुख्यमंत्री, उपप्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, मंत्री, डॉक्टर, इंजीनिअर, उद्योगपती हुआ भी तो उसे दलित कहकर बडी चालाकी से हमारे समाज की गरीबी एवं दुर्बलता को आगे कर हमारे समाज का नामकरण दलित किया गया है. लेकिन साली, माली, कोली, भंडारी, लुहार, बढई, धोबी, कुम्हार जैसे और अन्य सवर्ण हिन्दू जाति हमसे भी अधिक गरीब है. फिर भी उन्हे दलित नही कहा जाता, कारण वे सवर्ण हिन्दू है. इसलिए उन्हे हिन्दूजन कहा जाता है. इसी से हमारे हिन्दूस्तान में हिन्दूओं को हिन्दूजन, मुसलमान को मुसलमान, बौद्ध को बौद्धजन कहा जाता है. पर हमारा चर्मकार समाज हिन्दू है तो हमें दलित हरिजन क्यों कहा जाता है?
हजारों सालों की परंपरा वाले भगवान मनु के सनातनी हिन्दू धर्म अर्थात ब्रह्माण, क्षेत्रीय, वैश्य, शूद्र और अति शूद्र अर्थात सतगुण, तमोगुण, रजोगुण, गुणहीन व अस्पृश्य यह गुण विशेष रखने वाले मनुष्य स्वभाव के अनुसार हिन्दू समाज का वर्गीकरण है. सवर्ण हिन्दू समाज की 3527 जातियां और बारह बलुतेदार है. पर वर्णबाष्टद्धr(39) अस्पृश्य समाज की 118 जातियां और आलुतेदार है. सवर्ण बलुतेदारों को उनके अधिकार का बलुत दिया जाता था. पर अस्पृश्य अलुतेदारों को भीक दी जाती थी. क्योंकि अस्पृश्यों का हिन्दू समाज मे समावेश किया भी गया फिर भी हिन्दू धर्मशास्त्राह के अनुसार केवल सवर्ण ही हिन्दू है इसलिए अस्पृश्यों को हरिजन, दलित समझकर भीख दी जाती थी.
शून्य की खोज भारत में हुई. शून्य से गणित की निर्मिती हुई. गणित का उपयोग कर पिन से लेकर परमाणु बम तक सभी खोज सर्वप्रथम परदेशी वैज्ञानिकों ने की. बुद्धि का स्रे रहे भारत में सिर्फ ग्रह तारों, कुंडली, हस्तरेखा और भविष्य बताने के लिए गणित का उपयोग किया गया. किसी एक वर्ण अथवा जाति ने नही परंतु समस्त हिन्दू समाज ने प्रगतिशील ज्ञान के दरवाजे धर्म, धर्मशास्त्र और पुराणों के आगे जाकर कुछ भी नही ऐसा समझकर बंद कर रखे थे. ऐसा होने के बावजूद इसी धर्म, धर्मशास्त्र के अनुसार हिन्दू धर्म की जिम्मेदारी जिन पर है वे ब्राह्मण, पंडीतों ने हिन्दू धर्म के नित नियम बताने के लिए ही अपनी काई पीढियां लगा दी और 8०० साल मुसलमानों की सत्ता और 15० साल अंग्रेजो की गुलामी के समय हिन्दू धर्म परम्पराओं का रक्षण किया तथा सवर्ण हिन्दू धर्म, वर्ण, जाति व्यवस्था, एक स्ांघ मजबूत होने की पुष्टि की.
संपूर्ण भारत में 118 जाितयों मे विभक्त, असंघठित अस्पृश्य समाज की अवस्था, मां खाना देती नहीं और बाप भीख मांगने देता नहीं, ऐसी हुई थी. मुसलमान, हिन्दू समझकर अस्पृश्यों पर अत्याचार करते थे और सवर्ण हिन्दू अस्पृश्य जाति का बताकर उन पर अत्याचार करते थे इससे मुस्लिम धर्म स्विकार कर राजाश्रय मिला तो मुसलमानों के अत्याचारों से मुक्ति मिलेगी और सवर्ण हिन्दू धर्मीयो के अत्याचारों से हमेशा के लिए छूटकारा मिलेगा इसी कारण हजारों अस्पृश्यों ने मुस्लिम धर्म स्वीकार किया. आगे अंग्रेजों के काल में वही अनुभव लेते हएॅ हजारों अस्पृश्यों ने क्रिष्टद्धr(155)न धर्म स्वीकार किया और आज भी अनेक अस्पृश्य लोग ईसाई धर्म का सहारा ले रहे हैं. उसे रोकना आवश्यक है इसलिए भारतीय संस्कृति के आधार सत परम्परा की विरासत और हिन्दू धर्म के ही एक अंग के रूप में उदयोन्मुख भगवान रविदासजी का आध्यात्मिक रविदासिया धर्म समस्त अस्पृश्य समाज में फैलाने सवर्ण हिन्दू धर्मायों को मदत का हाथ आगे कर हिन्दू धर्म के अस्पृश्यता का कलंक मिटाना चाहिए. उस समय संत महापुरुषों ने अस्पृश्यों के प्रति आस्था, प्रेम, करुणा और दया भाव व्यक्त कर अस्पृश्यों का कुछ अनुपात में धर्मातर को रोका अन्यथा संपूर्ण भारत के अस्पश्यों का मुस्लिम, क्रिष्टद्धr(155)न धर्म में धर्मातर होकर हिन्दू धर्म की अस्पृश्यता हमेश के लिए नष्ट हो गई होती. अस्पृश्यों के धर्मातर को रोकने संत, महापुरुषों ने अस्पृश्यता को लेकर दयाभाव व्यक्त कर अस्पश्यों दलितों के सामाजिक, शैक्षणिक, íथक उन्नति के लिए उल्लेखनीय कार्य किया. इसका इतिहास गवाह है परंतु अस्पृश्य जाति में जन्मे हुए और अस्पृश्यता की प्रत्यक्ष आंच का अनुभव लिए हुए गुरु रविदासजी महाराज और परमपूज्य डा. बाबासाहेब अम्बेडकर ने अस्पृश्यों को भारतीय समाज व्यवस्था में समान सामाजिक दर्जा और प्रतिष्ठा दिलाने के लिए हिन्दूवर्ण व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष कर नया इतिहास रचा.
ष्टद्धr(39)ष्टद्धr(39)चौदह सौ तेंतीस की माघ सुधी पंद्रास । दुखियों के कल्याण हित प्रगटे श्री रविदास ।ष्टद्धr(39) काशी, बनारस, सीरमोवर्धनपूर में विक्रम सवंत 1433 (ई.स. 1377) को माघ शुद्ध पूर्णिमा दुखियों का कल्याण करने के लिए ही भगवान रविदासजी का जन्म अस्पृश्य जाति में हुआ. उस समय कठोर अस्पृश्यता ऊंच-नीच का पालन किया जाता था फिर भी गुरु रविदासजी का मानव कल्याणकारी उपदेश सुनकर राजा नागरमल, राणा वीर बघेल सिंह, सिकंदर लोधी, माहाराणा संग्राम सिंह, राजा चंद्रप्रताप, राजा अलावदी बादशाह, बिजली खान, राणा रतन सिंह, महाराणा कुं भाजी, महारानी झालीबाई, महान संत मीराबाई, बेबी कर्माबाई, बेबी भानमति, संत गोरखनाथ सहित सभी वर्गो के राजा - महाराजा गुरू रविदासजी के शिष्य हुए. गुरु रविदासजी ने कभी भी अपनी जाति नही छिपाई. ष्टद्धr(39)मेरी जातिोब्ोखियात चमारष्टद्धr(39) ऐसा डंके की चाटे पर कहते. गुरु रविदासजी महाराज ने समस्त चर्मकार समाज को गौरान्वित किया है. अस्पृश्य समाज हिन्दू धर्म में गिने जाने के बाद भी वह सवर्ण हिन्दू नहीं है यह सत्य बताते हुए गुरु रविदासजी कहते है. ष्टद्धr(39)चार बरण बेद से प्रकट। आदि जनम हमाराष्टद्धr(39) ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य और शूद्र यह चार वर्ण वेदों से प्रकट हुए है, ऐसा तुम कहते हो, लेकिन चर्मकार समाज उससे भी पहले वेदपूर्व काल का है. इससे सवर्ण हिन्दू धर्म और चर्मकार समाज का किसी भी रूप मे कोई भी संबंध नही है अर्थात चर्मकार समाज सवर्ण हिन्दू धर्म से पूरी तरह अलग है और चर्मकार समाज सवर्ण हिन्दू धर्म में समाविष्ट नहीं है, यह कहते हुए गुरू रविदासजी महाराज ने हिन्दू वर्ण व्यवस्था को पहला धक्का दिया. ष्टद्धr(39)ष्टद्धr(39)मेरी जाती कूट बांडता ढोर ढावंता, नितही बनारसी आस पासष्टद्धr(39)ष्टद्धr(39). काशी, बनारस के पास बस्ती में रहने वाले मेरी जाति के लोग हर रोज मरे हुए जानवरों को खींचकर ले जाने का काम करते हैं. ऐसा बताते हुए गुरू रविदासजी ने चर्मकार समाज का दुख विश्व के सामने लाकर खडा किया और उनके लगभग प्रत्येक दोहे में ष्टद्धr(39)कहे रविदास चमाराष्टद्धr(39) कहकर संपूर्ण भारत के गांव खेडे में बिखरे हुए चर्मकार समाज के हृदय में आदरयुक्त सम्मान, अपनेपन का स्थान निर्माण कर प्रेमानुबंध स्थापित किया, इसी कारण संपूर्ण भारत के चर्मकार समाज के आदर्श (आयडल) रहे भगवान रविदासजी महाराज के नाम पर हमारा चर्मकार समाज एक संघ हो सकता है, इसका विश्वास है.

आज अस्पृश्यता खत्म हो चुकी है? जय रविदास, जय भीम, जय गुरूदेव बोलो!


जय रविदास, जय भीम, जय गुरूदेव बोलो!

आज अस्पृश्यता खत्म हो चुकी है. अस्पृश्य समाज को भारतीय संविधान का संरक्षण प्राप्त है  फिर भी हमारे चर्मकार समाज का प्रतिनिधीत्व करने के लिए सरकारी आरक्षीत कोटा संभालने वाले सरकारी अधिकारी, विधायक, सांसद, राजनितिक पार्टयिों के नेंता, समाज के नेता केवल चमार बस्ति में आने के बाद चिल्लाते हुए दिखाई देते है. लेकिैन उनके सरकारी कार्यालयों, विधानसभा, उनकी पार्टी में चर्मकार समाज के बारे में एक शब्द भी नही बोलते है. वहा पर उन्हे जाती की शर्म आती है. इसीलिए संपूर्ण भारत के गांवकस्बो में चर्मकार समाज बडे पैमाने पर मतदाता होने के बावजूद उसे राष्ट्रीयस्तर पर कहीं भी अस्तित्व दिखाई नही देता है. हमारे समाज के सामाजिक, राजनतिक अस्तित्व को प्रस्तापित करने के लिए जाति मत छिपाओ अपनी जाति का नाम बिना शर्माए हुए बताओ और जय रविदास, जय भीम, जय गुरूदेव बोलो! 
गुरू रविदास महाराज कहते है ष्टद्धr(39)मेरी जाती भी ओछी पात भी ओछा, आछा कसब हमारा.ष्टद्धr(39)ष्टद्धr(39) उच्च दर्जे की मेरी चमार जाति है. मेरा आध्यात्मिकता का मार्ग भी ऊंचे दर्जे का है और मरे हुए जानवरों के बेकार चमडे से बहुउपयोगी सुंदर हस्तकला बनाने का ऊंचा कार्य मेरे समाज का कौशल्य कलाकरी भी ऊंचे दर्जे की ही है. यह कहकर चर्मकार जाति का, व्यवसाय का गौरव गुरु रविदासजी महाराज ने किया, परंतु हिन्दू धर्मशास्त्राहने अस्पृश्य ठहराने से कलंकित हुई जातियो को चिपककर रहना न पडे इसलिए ष्टद्धr(39)मेरी जाती कमीनी, पांती कमीनी ओछा जनम हमारा.ष्टद्धr(39) उच्च कुल मे जन्मे हमारे चर्मकार समाज को और हमारे व्यवसाय को अस्पृश्य जाति-पाति का कलंक लगाया है. यह कहकर गुरू रविदास कहते है, ष्टद्धr(39)जात पात के फेरे मही, उरझी रहयी सब लोग, मनुष्य को खात हयी रविदास जातका रोग.ष्टद्धr(39) जाति-पाति के चक्रव्यूह मे फंसने से रोग पीडित मृतवत स्वाभिमान शून्य हुए चर्मकार समाज में जाति-पाति का चक्रव्यूह तोडकर बाहर निकलने की ऊर्जा, शक्ति और स्वाभिमान जागृत होना चाहिए और जाति-पाति के विरुद्ध बगावत करने के लिए चर्मकार समाज में शक्ति निर्माण होने कूल, वर्ण बाष्टद्धr(39), अस्पृश्य, जाति-पाति का अंत करने के लिए स्वाभिमान चर्मकार समाज में निर्माण होना चाहिए इसलिए गुरू रविदासजी महाराज ने चमार जाति का अर्थात चर्मकार समाज का गौरवपूर्ण इतिहास बताया है.
जय रविदास, जय भीम, जय गुरूदेव बोलो!
गुरु रविदासजी कहते है, ष्टद्धr(39)जनम जात कू छाडि करि करनी जात प्रधान । इहयो चासा धर्म कहे रविदास बखान ।ष्टद्धr(39)ष्टद्धr(39) हमारे समाज के जन्म के साथ ही जोडे गऐ अस्पृश्य जाति का त्याग कर गुरू रविदासजी ने कथन किया हुआ सच्चे धर्म को स्वीकार करने के सिवाय चर्मकार समाज को सामाजिक प्रतिष्ठा प्रमुखता नही मिलेगी. आगे ष्टद्धr(39)बेगमपुरा शहर को नाउ।ष्टद्धr(39) अपनी रचना में गुरु रविदास कहते है, ष्टद्धr(39)कहि रविदास खलसा चमारा, जो हम सहरी सू मितू हमारा ।ष्टद्धr(39) हमारे साथ चिपके हुए चमार जाति का अंत कर स्वतंत्र रविदासी संस्कार के बेगमपुरा शहर, वतन अर्थात मानव के दुख मुक्ति का मार्ग रहे स्वतंत्र आध्यात्मिक रविदासिया धर्म स्वीकार कर मित्र साथी बनाने का आह्वान सभी चर्मकार बंधुओं से गरु रविदासजी महाराज करते हैं.

हिन्दू धर्म के लोग हमें दलित, हरिजन समझकर दूर रखते है

समस्त अस्पृश्यों को स्वतंत्र धार्मिक पहचान, संघ शक्त और
भारतीय समाज व्यवस्था में समान सामाजिक दर्जा प्राप्त हो
परमपूज्य डा. बाबासाहेब अम्बेडकर ने महात्मा गांधी के विरोध को ताक पर रखते हुए गोलमेज अधिवेशन में अस्पृश्यों का पक्ष प्रभावी रूप से पेश किया और हिन्दू,मुसलमान, शिख, एंग्लो इंडियन की तरह बहिष्कृत अस्पृश्य जाति भी स्वतंत्र वर्ग है और इन सभी जाति हिन्दू धर्म के बाहर है. उसी तरह इन सभी जाति हिन्दू धर्म में समाविष्ट नही हैं, यह सिद्ध कर राजकीय सत्ता में क्रमानुसार हिन्दू और मुसलमान, सिख की तरह पददलितों को भी सत्ता में योग्य विभाजन और भारतीय संविधान में अस्पृश्यों के हित संबंधो की रक्षा करने की व्यवस्था की.
17 अगस्त 1932 को ब्रिटीश सरकार द्वारा प्रधानमंत्री रैम्से मैकडोनाल्ड ने जाति विषयक  प्रश्नों को निर्णय (कम्यूनल आवर्ड) घोषित किया और मुसलमान, ईसाई, सिख, एंग्लो इंडियन की तरह अस्पृश्य समाज के लिए स्वतंत्र निर्वाचन क्षेत्र और इसके अलावा सर्वसाधरण मतदान क्षेत्र में
अस्पृश्यों को केवल आरक्षण संरक्षण दिलाना काफी नही
अस्पृश्यों को ज्यादा मत देने का अधिकार दिया. अस्पृश्यों को दिए गए स्वतंत्र निर्वाचन क्षेत्र के विरोध में
2० सितंबर 1932 येरवडा, पुणे की जेल में महात्मा गांधी ने अनशन किया और उससे स्वतंत्र मतदाता क्षेत्र के बदले मध्यवर्ती कानून मंडल में अस्पृश्यों को 18 प्रतिशत आरक्षित जगज और आरक्षित जगह का तत्व सर्व जातियों में एकसमानता होकर रद्द होने तक अमल करें और इस तरह की शर्त पर परमपूज्य डा. बाबासाहेब अम्बेडकर और महात्मा गांधी के बीच करार हुआ. वही ऐतिहासिक पुणे करार है. पुणे करार के जरिये भारत के समस्त अस्पृश्यों के राजकीय, सामाजिक अधिकार प्रस्तावित कर परमपूज्य डा. बाबासाहेब अम्बेडकर ने हमारे जीने का मार्ग सुखमय किया.
अस्पृश्यों को केवल आरक्षण संरक्षण दिलाना काफी नही और सामाजिक, राजकीय, शैक्षणिक और आíथक उद्देश्य से शुरू हुए संगठन कालांतर से समाप्त होने अथवा बंट जाने से यह संगठन स्थायी रूप का न होने पर कोई भी व्यक्ति इस संगठन से हमेशा के लिए बंधा नहीं रहता. धार्मिक संघ के प्रत्येक व्यक्ति का एक दूसरे से भावनात्मक अनुबंध जुडे होते है, इसलिए धर्मसंघ के प्रत्येक व्यक्ति धर्म संघ से हमेशा के लिए जुड जाते है लेकिन अस्पृश्यों का अपना स्वतंत्र धर्म नहीं. धर्म, संघ, शक्ति न होने से जातियों में विभक्त अस्पृश्यों पर हमेशा अन्याय, अत्याचार होते रहेंगे. यह पहचान कर भारत के समस्त अस्पृश्यों को स्वतंत्र धार्मिक पहचान, संघ शक्त और भारतीय समाज व्यवस्था में समान सामाजिक दर्जा प्राप्त हो इसलिए परमपूज्य डा. बाबासाहेब अम्बेडकर ने 13 अक्टूबर 1935 को ऐवले में धर्मातर की घोषणा की और कहा, अस्पृश्य हिन्दू का दाग लेकर मैं जन्मा, परंतु यह मेरे हाथ में नही था, लेकिन हिन्दू कहलाकर मै मरना नहीं चाहता और उसके अनुसार 14 अक्टूबर 1956 को नागपूर में बौद्ध धर्म की दीक्षा ली और लाखों जनसमूह को बौद्ध धर्म की दीक्षा दी और समस्त अस्पृश्यों के विश्व के बौद्ध धर्मियों से प्रेमानुबंध स्थापित किया.
इस महान बौद्ध धर्म क्रांति का हमने अपने अज्ञान से, जाति अहंकार से हम सहभागी न हो सके और इसीलिए हमने बौद्ध धर्म को स्वीकार नही किया. बौद्ध धर्म के लोग हमें अपना नहीं समझते. हम मुस्लिम, ईसाई, सिख, जैन धर्म के न होने से उस धर्म के लोग हमें अपना नहीं समझते, जिस हिन्दू धर्म को हमने अपना धर्म माना उस हिन्दू धर्म के लोग हमें दलित, हरिजन समझकर दूर रखते है. जिस जाति के हम है उस चर्मकार समाज में असंगठित 11 सौ जातियां है और प्रत्येक जाति अपना अलगपन जतन कर सवर्ण हिन्दू लोगों की शाबासी लेने चमारपन का जतन करते हिन्दू धर्म के पांव तले इमानदारी से अपनी पीढियों को जन्म दे रहे है, इसलिए चर्मकार समाज में संघशक्ति का अभाव है. हमारा कोई रखवाला नहीं और हमें चुपचाप अत्याचार सहन करना हमारे नसीब में ही है, ऐसी भावना अपने चर्मकार समाज मे बनी हुई है.
अस्पृश्य, हरिजन, दलित की उपाधि से अपमानित हुए अपना समाज अपनी जाति का नाम बताते हुए शर्माता, परंतु हिन्दू धर्म का होने से मैं हिन्दू हूं, ऐसा अभिमान से बताता है. दूसरी और सवर्ण हिन्दू अपनी जाति का नाम खुलकर बाताते है, जो सच्चा हिन्दू और अपनी जाति का नाम बताने में संकोच करता है, वह झूठा हिन्दू है.
सच्चे हिन्दू धर्म में समाविष्ट सवर्ण हिन्दू जातियों को समाज में समान सामाजिक दर्जा प्राप्त है, इसलिए सवर्ण हिन्दू जाति उपजाति के लोग एक वर्तुल में एक संघ होकर रहते है. अज्ञान,अशिक्षा, गरीबी, गंदे रहन-सहन होने से उनमें भेद नही किया जाता. एक विशिष्ट जाति व्यवसाय से उस
प्रत्येक जाति को धार्मिक, सामाजिक,
समान दर्जा
, साख और प्रतिष्ठा प्राप्त है
व्यक्ति को अथवा जाति को दूर नही किया जाता. किसी सवर्ण हिन्दू जाति के व्यक्ति के हाथ से कोई बडा अपराध हुआ भी तो उस जाति को लक्ष्य बनाकर अत्याचार या उस जाति के घर-मकान जलाने के उदाहरण सुनाई नही पडते
, लेकिन परधर्मियों के छेडने पर अथवा अस्पृश्य जाति पर अत्याचार करने के लिए सवर्ण बहुजन हिन्दू जाति एकता की ताकत दिखती है. इससे स्पष्ट हो जाता है कि हिन्दू धर्म सिर्फ सवर्ण हिन्दू जातियों का संवर्धन व रक्षा करने के लिए रचा हुआ है. अत: सवर्ण हिन्दू जातियों मे आ
íथक विषमता के बावजूद प्रत्येक जाति को धार्मिक, सामाजिक, समान दर्जा, साख और प्रतिष्ठा प्राप्त है और इसीलिए साधु-संत, महात्मा, समाज सुधारकों ने गत अनेक शतकों से गला फाडकर बताया कि वर्णभदे , जातीभेद, अस्पृश्यता हिन्दू धर्म पर लगा हुआ कलंक है. परंतु हिन्दू धर्म कलंकित है एसा एक भी सवर्ण हिन्दू जाति का व्यक्ति नहीं मानता. अस्पृश्य, हरिजन दलित के लोग कलंकित, अपवित्र हैं यह बात प्रत्येक सवर्ण हिन्दू मानता है. इसीलिए जिस हिन्दू धर्म को हम अपना धर्म मानते है, समझते है उस हिन्दू धर्म के हमारे धर्म बंधू हमें कलंकित, दूषित, अपवित्र, अस्पृश्य मानते है, जिससे परधर्मियो के मुस्लिम, ईसाई, पारसी, जैन, सिख धर्म समाज भी हमें कलंकित, दूषित, अपवित्र, अस्पृश्य समझकर हमारे साथ व्यवहार करना टालता है.

हमें अपनी जाति का अभिमान होना चाहिए


हमें अपनी जाति का अभिमान होना चाहिए
जय रविदास ! जय भीम !! जय गुरुदेव !!!,


झूठे हिन्दू धर्म में समाविष्ट बहिष्कृत, अस्पृश्य, हरिजन, दलित जाति कलंकित, अपवित्र है, ऐसा मानकर हिन्दू धर्मशास्त्राह ने मान्यता देने से उन जातियों को अप्रतिष्ठा प्राप्त हुई है. हिन्दू धर्म के सबसे निचलेस्तर पर समझे जाने वाले हमारे समाज का जीवित रहने का अधिकार हिन्दू धर्मशास्त्राह ने छीन लिया है. आज हमारी जाति को मिल रही सहूलियतें, संवैधानिक अधिकार भारतीय संविधान ने दिए है. हिन्दू धर्मग्रंथमें सुधार (अमेंटमेंट) कर हमें अधिकार नहीं दिए, इसलिए आज भी हम हिन्दू धर्मशास्त्राह के अनुसार कलंकित, अपवित्र ठहरते है. हमारे समाज की यह अवस्था किसी भी एक व्यक्ति या समाज ने नही की, जिस हिन्दू धर्म को हम अपना धर्म समझते है उस धर्म के धर्मग्रंथों द्वारा विहित तत्व नियम, कानून से हमारे समाज की यह अवस्था हुई है और हिन्दू धर्म के नियम, कानून, सानातनी होने से वे बदले भी नही जाते. हमारी इस अवस्था के लिए सवर्ण बहुजन हिन्दू जाति का व्यक्ति या समाज जिम्मेदार नहीं है, वे तो केवल हिन्दू धर्मशाधिं में विहित नियमों का पालन कर रहे है.
हम जब तक हिन्दू धर्म से जुडे रहेंगे तब तक हिन्दू धर्मशास्त्राह के नियम व कानून के अनुसार किसी व्यक्ति या समाज की इच्छा रहे न रहे हिन्दू के हमारे कलंकित दर्जे अपवित्र ही रहेंगे और इससे धार्मिक, सामाजिक हक के लिए हिन्दू धार्मियों से हमेशा लडते रहना होगा. दलितों के ऊपर अत्याचार का मूल कारण दलितों ने धार्मिक सामाजिक हक के लिए किए संघर्ष व उससे दलित और सवर्ण हिन्दू जाति के बीच हुई कटुता है और इसलिए स्वतंत्र रविदासीया धर्म स्वीकार करने से झगडे के लिए कोई कारण ही बाकी नही रहेगा.
विश्व के किसी भी धर्म में किसी भी व्यक्ति अथवा समाज को प्रवेश लेने की सहूलियत है, परंतु हिन्दू धर्म में प्रवेश लेने के लिए सवर्ण हिन्दू माता के पेटे से ही जन्म लेना पडता है. धर्म दीक्षा लेकर अथवा धर्मातर कर हिन्दू धर्म में प्रवेश नही लिया जा सकता अर्थात अस्पृश्यों को सवर्ण हिन्दू नही बनाया जा सकता. यह सूर्य प्रकाश की तरह इसके सत्य को नजर अंदाज करते हुये, साधु, संत, महात्मा, समाज सुधारकों ने हिन्दू धर्म से पूर्णरूप से अलग हुए परंतु जीनका स्वतंत्र धर्म नही है, यह जानते हुय भी अस्पृश्य समाज को समाजसुधारक का केंद्र बनाकर हिन्दू धर्म से जोडकर हिन्दू धर्म तुम्हारा ही है. हमें अपनी जाति का अभिमान होना चाहिए गर्व से कहो हम हिन्दू है, इस प्रकार के जाति भेद अस्पृश्यता नष्ट करने की बडी-बडी बातें कर हिन्दू धर्म के वर्तुल के बाहर रखने हिन्दत्३ व की मोहर लगाकर जैसे है वैसी ही स्थिति में छोड दिया. इसी धरती पर आजकल के हमारे समाज के नेता, लेखक, चिंतक, बामसेफ वाले काम कर रहे है.
परमपूज्य डा. बाबासाहेब अम्बेडकर ने अपने राजनीतिक सफर की शुरूआत करते समय 15 ऑगस्त 1936 को स्वतंत्र मजदूर पक्ष की स्थापना की. उस पार्टी से मुंबई मे चुनाव भी लडे, परंतु उसके बाद ब्रिटिश सरकार के स्टैनली कमेटी के सामने गवाही देते समय तुम अस्पृश्यों के नेता कैसे? तुम्हारी पार्टी तो सभी जाति धर्मियों की है, ऐसी हरकत लिए जाने से उसी क्षण परमपूज्य डा. बाबासाहेब अम्बेडकर ने मजदूर पार्टी को बर्खास्त किया और 2० जूलै 1942 नागपूर मे  शेडय़ूल्डकास्ट फेडरेश नाम का बहिष्कृत अस्पृश्य वर्ग का स्वतंत्र राजकीय पार्टी स्थापित कर देशभर के तमाम अस्पृश्य समाज की व्यथा स्टेनली कमेटी के सामने रखी. आज भी 2० करोड अस्पृश्य समाज हिन्दू धर्म के पांव के पास हरिजन दलित के रूप मे सवर्ण हिन्दू बहुजन समाज के दबाव तले जी रहा है. और हमारे समाज के नेता, लेखक, चिंतक, बामसेफ वाले अस्पृश्य समाज की ओर पीठ दिखाकर सवर्ण हिन्दू बहुजन समाज के लिए जी-जान से काम कर रहे हैं और यह जानते हुए कि, इससे अस्पृश्य समाज को कोईभी लाभ नही होगा. ब्राह्मणवाद, मनूवाद, वर्णजात और देवी देवताओं पर टिका टिपण्णी करने मे ही गर्व महसस्३ो कर रहे है. यह हमारे समाज का दुर्भाग्य नही तो ओर क्या ह?
ब्राह्मणवाद, मनुवाद, जातीवाद, वर्ण, जाति, देवी, देवता श्रद्धा-अंधश्रद्धा यह हिन्दूस्तान के चमारों की समस्या नही है. प्रचलीत कानून, अंतर जातिय विवाहों के चलते भविष्य मे यह खलास नही हुयी तो भी इसकी तिवृता जरुर कम हो जाएगी. चमारों की बडी समस्या है, उनका अपना कोई धर्म नही है. यही कारन है की संपूर्ण हिन्दूस्तान मे 11 सौ जाति 2० करोड से भी ज्यादा जनसंख्या, व्यवसायीक समानता, एकजैसी पहचान होने के बावजूद भी चमार जाति एक संघ नही है.
दूसरी और सवर्ण हिन्दू समाज अनेक वर्ण जातियों मे बटा हुआ उपरी तौर पर हमे दिखाई देता है. वे अनेक पक्ष पार्टीयों के प्रमुख बने बैठे है. एक दूसरे के उपर किचड उछालते नही थकते. परंतु हिन्दू धर्म के नाम पर एक संघ हो जाते है. और देवि देवताओं के उत्सवों में अपनी ताकत दिखाते है. मुस्लिम समाज मे भी अनेक पंथ जाति है. मुसलमान सभी पक्ष पार्टयिों मे शामील है. फिर भी मुस्लिम धर्म के नाम पर मस्जिदो में एक हो जाते है. इसाईयों मे अनेक पंथ जाति है. वे सभी पक्ष पार्टयिों में शामील है. परंतु इसाई धर्म के नाम पर चचरे मे एक संघ हो जाते है.
अभि-अभि तक अस्पृशों का ही भाग रहे बौद्ध समाज अनेक पक्ष पार्टयिों मे शामील है. बौद्ध धर्म के नाम पर बौद्ध विहारों मे एक संघ हो जाते है. परंतु चमारों का अपना कोई धर्म नही है. ना कोई मंदिर, ना कोई मस्जिद , ना कोई चर्च है. व तो दूसरों के धर्म को ही अपना धर्म मानते है. दूसरों के मंदिरो मे ही जाते है. तो सोचिये 11 सौ जातियों मे बिखरे चमार एक संघ कैसे और कहां पर होते. यही कारण है कि भारत के इतिहास मे सदीयों से करोडो अस्पृश्यों के साथ जानवरों जैसा बल्की उससे भी बदतर व्यवहार किया जाता रहा उन्होने कभी विद्रोह नही किया. इसलिए जिस प्रकार हिन्दू - मंदीर, मुस्लिम - मसजिद, सिख - गुरूद्वारा, इसाई - चर्च, बौद्ध - बौद्ध विहार गांव-कस्बों मे अपने धर्म की धरोहर निर्माण करने मे जि जान लगा देते है. उसी प्रकार हमे भी प्रत्येक गांव-कस्बों के अपनी चमार बस्तियोंमे रविदास मंदिर और तहसिल स्तर पर रविदास भवन बनाने के लिए हमे अपना सर्वस्व अर्पण करना होगा. तभी हमारी आगामी पिढीया रविदासीया धर्म के नाम पर रविदास मंदीरों मे एक संघ होगी.